ग़ज़ल = ओनिका सेतिया 

ग़ज़ल = ओनिका सेतिया

क्यों लंबी होती हैं घड़ियां इंतजार की,
लय बढ़ने लगती है दिल-ऐ-बेकरार की।

हर एक लम्हा बड़ी मुश्किल से कटता है,
धीमी हो जाती जैसे चाल वक्त के रफ्तार की ।

यह इंतजार कितना है भारी वो क्या जाने,  
जिस पर न गुजरी हो कभी घड़ी इंतजार की।

उम्मीद/नाउम्मीदी के बीच झूलता यह इंसा ,
नहीं समझ पाता रज़ा बेरहम तकदीर की ।

अश्कों को तो समझा दे ये " अनु" किसी तरह ,
मगर क्या दवा करे अपने दिल-ए-बेकरार की।
=ओनिका सेतिया, फरीदाबाद , हरियाणा
 

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