गज़ल = रूबी गुप्ता

गज़ल = रूबी गुप्ता

उम्र कतरा कतरा गुजरती  है|
उम्र पर आकर फिर सँवरती हैं|

छुपाकर ख्वाहिशे  मन  में,
औरत चालीस पार करती है|

ज़ख्म नासूर बन उभरते है,
दर ख्वाबों से गुजरती है|

भीतर से खोखली होकर भी,
रिश्तों से जिन्दगी भरती है|

फिर लौटने का मन होता है,
लेकिन मुसाफ़िरो से डरती है|

'रुबी' की रंगत भी फिकी यहाँ
हर रोज टूटती और बिखरती है|
= रूबी गुप्ता , दुदही, कुशीनगर , उत्तर प्रदेश
 

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