ग़ज़ल = विनोद निराश 

ग़ज़ल = विनोद निराश

आज भीड़ मे तन्हा नज़र आया हूँ ,
जाने क्यूँ उनकी नज़र मे पराया हूँ। 

वक़्त क्या बदला वो भी बदल गए,
जो कहा करते थे कभी हमसाया हूँ। 

न कर शिकवा ए दिल-ए-नाशाद, 
बार-बार दिल को ये समझाया हूँ। 

वो जख्मे-दिल को जगाते रहे पर ,
मैं ख्वाहिशों को सुला के आया हूँ। 

तू लाख सितम कर पर याद रख ,
बर्क की जद मे मकां बनाया हूँ। 

बेशक तूफ़ां आये अब तो निराश,
दिल मे शहरे-तूफ़ां बसा आया हूँ। 

= विनोद निराश , देहरादून 

दिल-ए-नाशाद = अप्रसन्न हृदय / नाराज़ दिल 
बर्क =  बिजली 
जद  = पास में / निकट / जड़ मे 
मकां = घर 
शहरे-तूफ़ां = तूफ़ान का नगर / तूफ़ान का शहर
 

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