ग़ज़ल = विनोद निराश 

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तय था ये, इश्क़ में गम मिलेंगे, 
ताउम्र यादों के, मौसम मिलेंगे। 

सताया करेंगी जब कभी यादें तेरी , 
शुष्क आँखों के कोरे नम मिलेंगे। 

कभी याद किया करोगे भूले से हमें ,
रिश्ते वफ़ा के सदा पुरनम मिलेंगे।

हो गए अब तो वो भी परदेसी यारों , 
दीदार-ए-यार आँखों को कम मिलेंगे। 

कोई तो राह जाती होगी तुझ तक,
हर रहगुजर पे खड़े हमदम मिलेंगे।  

कब से सोच रहा है बेबस निराश, 
बिछुड़ कर क्या फिर हम मिलेंगे। 
= विनोद निराश , देहरादून
 

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