ग़ज़ल - विनोद निराश 

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यादे तुम्हारी सुरमई शाम हो गई ,
बातें इश्क़ की खाशो-आम हो गई। 

उठी जो प्यास तन्हा दिल में मेरे, 
आँखे तेरी शाम-ए-जाम हो गई। 

छोड़कर तुम ही गए थे  इक दिन,
मगर बातें मुझपे इल्ज़ाम हो गई।  

होता है जब कभी जिक्र-ए-वफ़ा,
बेवफाई जैसे मेरा इनाम हो गई। 

हम तो घुट-घुट के जिये निराश , 
जब तोहमतें सुब्हो-शाम हो गई। 

= विनोद निराश , देहरादून 
 

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