ग़जल - विनोद शर्मा 

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कभी लगता है, जिंदगी में कोई कमी नहीं है,
हरपल कुछ कमी,खालीपन नजर आता है।

बैठे रहते खामोश,टकटकी से देखते रहते हैं,
हर लम्हा यूं ही,आता है और गुजर जाता है।

लेनदारी न कोई देनदारी, फिर क्यों ऐसा लगे,
कर्ज़ कई जन्मों का जैसे हमें नज़र आता है।

अपने ही घर में अपनों से हर शख्स रूठा है,
दौलत की खातिर अपना ही क़हर ढाता है।

नासमझ को समझ कुछ नहीं आता रेखा,
हे भगवान तेरा बंदा ही ख़ुद ज़हर खाता है।

कैसा ये जीवन का दौर चल रहा है विनोद,
राह में अनजाना सा नजर हर मंजर आता है।
- विनोद शर्मा 'विश', दिल्ली
 

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