ग़ज़ल - झरना माथुर 

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शब भी अपने पूरे यौवन पर आयी है |
और चाँदनी देख चाँद को मुसकाई है |

उनकी चाहत की तड़प सागर सी गहरी, 
उसकी गहराई में मेरी तन्हाई  है |

इसी चाँदनी ने  की है मेरी रुसबाई, 
आँखों में तारों के मोती भर लाई है |

नशा ख़्वहिशों का है रातों के पहरों में, 
मेरे दिल में भी कुछ मस्ती सी छाई है |

झरना को तो आदत है धुन में बहने की,
भले इसी धुन में उसने ठोकर खायी है।
= झरना माथुर, देहरादून

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