छठ की महिमा - अनिरुद्ध कुमार

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सुमंगल कामना दिल में, मगन हो छठ मनाते है।
उदित पूजन करें दिल से, छठी माँ को जगाते है।
सुखी परिवार हो सारा, सदा चित में बसाते है।
कृपा माँ का सदा होवे, यही आशा लगाते है।।

किया तैयार घर सारा, सजा दरबार लगता है।
हवाओं में महक सोंधी, गजब संसार लगता है।
बिघ्न बाधा हरें माता, ब्रती मिल गीत गातें है।
उपासक शुद्ध होकर के, खुशी से छठ उठाते है।

प्रथम दिन में नहा खाये, तन मन शुद्धि बताते है।
ब्रती उठ दूसरे दिन में, गहूँ धोकर सुखाते है।
बनाते खीर,रोटी मिल, सभी खरना मनाते है।
शुरू उपवास साधक का, मगन हो चित लगाते है।

उपासक तीसरे दिन में, प्रसादी खुद बनाते है।
अरग का ठेकुआ, केला, करीने से सजाते है।
सभी सिर पर लिए डाला, नदी तालाब जाते है।
अस्त होते उदितमल को, अरग श्रद्धा चढाते है।

दिवस चौथा अरग देके, ब्रती छठ खत्म करते है।
प्रसादी बांटते सबको, खुशी से थाल भरते है।
महापर्व छठ की महिमा, बता किसको सुनाना है।
मुहब्बत प्यार जिंदा हो, मिलन का इक बहाना है।
- अनिरुद्ध कुमार सिंह, धनबाद, झारखंड
 

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