हलधर दोहे - जसवीर सिंह हलधर  

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1-
गांव गली की धूल से ,पायी सदा सुगंध ।
हलधर अंतिम सांस तक ,बना रहे संबंध ।।
2-
मंचों पर देखे बहुत , मियां बड़े मतलूब ।
देख लिफाफा बोलते ,हलधर को महबूब ।।
3-
जो छिटके वो पिस गए , हलधर अब क्यों रोय ।
कील किनारे जो बसे ,बाल न बांको होय ।।
4-
चलती चाकी मौत की ,हलधर रही लखाय ।
स्वर्ग सपन है खोखला ,धरती रही बताय ।।
5-
हलधर क्या देखे कभी ,दीवारों के कान ।
भय को भूत बखानता ,खाली पड़ा मकान ।।
- जसवीर सिंह हलधर, देहरादून   

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