दूभर जीना - अनिरुद्ध कुमार

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ऐसे जीना भी क्या जीना, 
           घुट घुटके आँसू है पीना।
बेचैनी तन मन को जारे, 
           साँसे खींचे तानें सीना।
    
ढ़ूंढ़ रहे क्या चाह मिटी ना,
            व्याकुलता ने सुख है छीना।
व्यथित हृदय ले मारे फिरते,
           काया माया मोह मरीना।
 
तन से टपके रोज पसीना,
           जोड़ रहे हर साल महीना। 
आते जाते चित भरमाये,
           सूनी आँखें नींद कहीं ना।
  
यह जीवन अनमोल नगीना,
           समझ इसे यह पारस मीना।
जतन करोगे सुख पाओगे,
           भवसागर का मान सफ़ीना।
    
धन दौलत से क्या क्या कीना,
            आह वाह की चाह घटी ना।
तन में पाले हर बीमारी, 
            चैन कहीं अब एक घड़ी ना।
 
बैठ बिचारे चाल चली ना,
            जो चाहे वो माल मिली ना।
जोड़े तोड़े कितने बंधन,
            फिर भी तेरी दाल गली ना।
    
होठों पर क्यों आज हँसी ना,
             सबकुछ पाके आज विहीना।
भूल गये जगके स्वामी को,
             हरि कृपा बिना दूभर जीना।        
- अनिरुद्ध कुमार सिंह, धनबाद, झारखंड

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