हमने कुछो गलत तो नहीं न किया ? - नीलकांत सिंह

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गुरुवार को भोरे-भोरे ये महाशय ऊपर मेरे कमरे में एक छिपकिली निगल कर आराम फरमा रहे थे। झाड़ू देते वक्त अचानक मुँह उठाकर पत्नी के सामने खड़े हो गए..फिर तो उसी समय इनकी बोहनी हो गयी...झाड़ू की मार खाकर फिर कुछ देर दुबके रहे...तब तक हमें भी जगाया गया और पिताजी भी ऊपर आ चुके थे। फिर तो चप्पल से इनकी खूब ठुकाई हुई...अंत में मुझे ही दया आ गयी फिर मैंने इन्हें डंडे में लपेट कर हो-हल्ला के साथ घर से बाहर निकाला और मन्दिर के पास के हरे-भरे छोटे से मैदान में छोड़ दिया...महाशय कुछ देर तक तो अचेत रहने का नाटक किए, फिर एक बार मन मसोसकर मेरी तरफ देखा और छटपटाकर भागे।
काकी कह रही थीं अरे इसको जान से नै मारिए ई तो सँखड़ा है...इसमें जहर नहीं होता।
मैंने काकी की बात मान ली।
वैसे भी हमारे घर में साँपों को मारा नहीं जाता और आस्तीन में विषधर पालना तो अपने देश का राष्ट्रीय स्वभाव है।
बाकी आप लोग बताइये हमने कुछो गलत तो नहीं न किया...आंय?
✍️नीलकांत सिंह, मझोल, बेगूसराय, बिहार  

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