वो गुज़रा ज़माना = विनोद निराश

वो गुज़रा ज़माना = विनोद निराश

आज भी बहुत याद आता है,
वो गुजरा ज़माना। 
अपनी बात कहते-कहते,
तेरा अचानक रुक जाना। 
वो तेरा साथ-साथ चलना,
ख्वाहिशों का पलना। 
मगर जब कभी मैं ,
अतीत में खो जाता हूँ !
याद आता है फिर वही,
मुसलसल तेरी यादों के पन्नो का ,
हल्के से बार-बार पलटना।
तेरी यादें आज भी,
साथ तो चलती है,
मगर मुझे सालों पीछे ले जाकर,
तन्हा छोड़ देती हैं।
यादों के दोराहे पर खड़ा ,
सोचता रहता हूँ वो गुज़रा ज़माना। 
जाने क्यूँ आज भी आस लिए ,
निराश मन को क्यूँ पड़ता है बार-बार समझाना।
= विनोद निराश , देहरादून  (शुक्रवार 12 मार्च 03/2021) 

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