हिंदी ग़ज़ल  = जसवीर सिंह हलधर

हिंदी ग़ज़ल = जसवीर सिंह हलधर

जीवन के सब चरण अटल हैं ,भीड़ पड़ी तो डरना कैसा !
जन्म हुआ तो मरण अटल है ,नाम करे बिन मरना कैसा !

लेता चल तू रस कण कण का, कर्जा देता चल जन गण का,
मौत सहेली है जीवन की ,फिर इसका ग़म करना कैसा !

जीव जंतु की नीति पुरातन , जन्म मृत्यु है सत्य सनातन ,
झर झर पात गिरें पतझड़ में , डर डर आँसू झरना कैसा !

भव सागर की सजी पालकी ,सब पर चलती छड़ी काल की ,
धन बल का अब छोड़ आसरा ,कालिख बीच विचरना कैसा !

ये तन है माटी का टीला , बसता इसमें मन रंगीला ,
पूरा डूब महा सागर में , उससे पार उतरना कैसा !

पैसा तूने खूब कमाया ,सच बतला क्या काम ये आया ,
साथ नहीं दमड़ी जा पाए , फिर इससे घर भरना कैसा ।

जिसके दम पर झूल रहा तू , असली मालिक भूल रहा तू ,
जिसका अंश उसी में मिलना ,"हलधर" टूट बिखरना कैसा ।
 = जसवीर सिंह हलधर, देहरादून
 

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