हिंदी ग़ज़ल = जसवीर सिंह हलधर 

हिंदी ग़ज़ल = जसवीर सिंह हलधर

ईद का त्योहार आया प्यार से इसको मनायें ।
सावधानी से अदा कर के नमाज़ें-खीर खायें ।

रोग का यह कीट अब तो घुल चुका सारी हवा में ,
दीप संयम के जलाकर बांध दें तम की बलायें ।

ये बला है व्योम की या चीन की ये चालबाजी ,
हिन्द से हम भी दिखायें चाँद जैसी सौ कलायें ।

गरल भरती दृष्टियों का तोड़ दें झूठा दिलाशा ,
आयतों के पाठ से अब रोग को जड़ से मिटायें ।

तोड़ दें हम धुंध कुहरे से बनी दीवार सारी ,
मात देवें इस वबा को जोड़ देवें श्रंखलायें ।

इस समस्या का सुरक्षा ही बड़ा संधान यारो ,
शक्ति का संचार करती हैं सदा वैदिक ऋचायें ।

सैनिकों की भांति लड़ते दिख रहे योद्धा चिकित्सक ,
देश के इन बांकुरों को स्वर्ण लिपियों में सजायें ।

काल का पैगाम है यह या नए युग का विगुल है ,
हिन्द "हलधर" का करेगा तय सभी दुर्गम दिशायें ।
 = जसवीर सिंह हलधर , देहरादून
 

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