हिंदी गजल = जसवीर सिंह हलधर 

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आदमी का आजकल किरदार बौना हो गया है ।
जिंदगी का फलसफा अब तो करोना हो गया है ।

ढो रहा है आदमी कांधे सगों की लाश यारो,
मरघटों तक लाश लाना बोझ ढोना हो गया है ।

जो कभी सरदार थे सालिम हमारे गांव भर के ,
रोग के कारण ठिकाना एक कोना हो गया है ।

पक्ष या प्रतिपक्ष में अब खास अंतर ही नहीं है,
भ्रष्टता के दाग को तर्कों से धोना हो गया है ।

हिंदुओं की मौत हो या मुस्लिमों की मौत हो ,
राजनैतिक सोच का दर्शन घिनोना हो गया है ।

औरतों के जिस्म पर तो कीमती पोशाक दिखते ,
अंग प्रदर्शन न जाने क्यों खिलौना हो गया है ।

पैंतरे बदले रिबाजों ने यहां पर इस तरह से ,
बात शादी की चली तो साथ गौना हो गया है ।

ऑक्सीजन या दवाई की कमी से देश जूझा ,
पर जमाखोरों को ये मौसम सलौना हो गया है ।

अब कहाँ लैला कहाँ मजनू कहानी खोजते हो ,
आज "हलधर" प्यार तो बस साथ सोना हो गया है ।
    = जसवीर सिंह हलधर , देहरादून
 

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