हिंदी ग़ज़ल = जसवीर सिंह हलधर 

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ईंट पत्थर पिंजरे को लोग घर कहने लगे हैं ।
मूर्ख हैं वो भीड़ को भी जो शहर कहने लगे हैं ।

आधुनिकता का चढ़ा है देश में अब भूत एसा ,
आदमी को आदमी का हमसफर कहने लगे है ।

अब नये पंडित विदेशी व्याकरण हमको सिखाते ,
वेद मंत्रों को भी वो खारिज बहर कहने लगे हैं ।

जो किसी भी मोड़ पर हमको भटकता छोड़ देती ,
उस डगर को भी यहाँ पर कारगर कहने लगे हैं ।

दूर गामी योजनाएं रच रही इतिहास अपना ,
कुछ विपक्षी देश की गति को सिफर कहने लगे है ।

पांच दसकों के लिए सरकार उन पर ही रही थी ,
उस समय सीमा को भी वो मुख़्तसर कहने लगे हैं ।

सत्य से संवाद करके रो रही है लेखिनी भी ,
गीत "हलधर" के लिखे को बे असर कहने लगे हैं ।
= जसवीर सिंह हलधर, देहरादून  
 

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