हिंदी ग़ज़ल = जसवीर सिंह हलधर 

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आ गया वो रूह में मंज़र नहीं देखा गया ।
पूजते  पत्थर  रहे अंदर नहीं देखा गया ।

आत्म मंथन के सफ़र में देह से ऊपर उठा ,
पार गरदन के गया तो सर नहीं देखा गया ।

देह में वो साथ था पर हम ही लापरवाह थे ,
जाम पीते  रह गए  रहबर नहीं देखा गया ।

छोड़ कर भागा हमें तो लुट गयी आवारगी ,
चार कांधे ले चले फिर घर नहीं देखा गया ।

फूल मांटी में मिला तो देखकर वो रो पड़े ,
बागवां के हाथ में खंजर नहीं देखा गया ।

देखते ही देखते जब कारवां धूमिल हुआ ,
धूप गायब हो गयी छप्पर नहीं देखा गया ।

बात आयी देश के सम्मान की तो चल पड़े ,
राष्ट्र ही मजहब हुआ तो डर नहीं देखा गया ।

मंच पर कविता नहीं जब गीत पैरोडी मिली ,
इस तरह के मंच पे "हलधर"नहीं देखा गया ।
= जसवीर सिंह हलधर , देहरादून 
 

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