हिंदी ग़ज़ल = जसवीर सिंह हलधर 

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लाश मेरे खेत में तुम क्यों दबाने लग गये ?
प्रश्न गंगा ने किया हम मुँह छुपाने लग गये ?

क्या चिता की लकड़ियां भी खा चुका है आदमी ?
लाश मेरी धार में अब क्यों बहाने लग गये ?

सभ्यता झकझोर डाली रोग के तूफान ने ,
पालने जिसको हमें इतने जमाने लग गये ।

रेत गंगा का गवाही दे रहा है घाट पर ,
चैनलों के लोग फोटो भी खिंचाने लग गये ।

लॉकडाउन में मदद तो की नहीं बीमार की ,
राजनैतिक गिद्ध मुद्दे को भुनाने लग गये ।

मौन है सरकार अपनी हिदुओं के हाल पर ,
आजकल मुर्दे भी हमको आजमाने लग गये ।

बेबसी को बेचना सीखे कोई अखबार से ,
पत्रकारों के वहां पर शामियाने लग गये ।

कौन है इसका रचियता  कौन जिम्मेदार है ,
प्रश्न "हलधर" ने किया आँखें चुराने लग गये ।
= जसवीर सिंह हलधर , देहरादून 
 

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