हिंदी ग़ज़ल = जसवीर सिंह हलधर 

pic

धुँए अब वादियों से आ रहे हैं ।
कहर अलगाववादी ढा रहे हैं ।

हवाओं में जहां केसर घुली थी ,
जहर उन घाटियों में ला रहे हैं।

शहर में आ घुसे आतंकवादी ,
सगा अपना उन्हें बतला रहे हैं ।

न कोई उनकी माँ ,बेटी, बहन है ,
कमीने कौम को भरमा रहे हैं।

बुझाते प्यास बच्चों के लहू से ,
खिलोने तोड़कर बिखरा रहे हैं ।

परिंदे घोंसलों में जा छुपे है ,
फलक में बाज भी मँडरा रहे हैं ।

उन्हें लाशों से जन्नत है सजानी ,
जमीं दोज़ख बनाये जा रहे हैं।

सिपाही भी खड़े बंदूक लेकर ,
दरिंदे गोलियां भी खा रहे हैं।

दफा"हलधर"हटाई तीन सत्तर,
जफ़ा उसके हमें गिनवा रहें हैं ।
 = जसवीर सिंह हलधर, देहरादून  
 

Share this story