हिंदी ग़ज़ल - जसवीर सिंह हलधर

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वो तो पुरानी याद भुलाकर चली गयी ।
नादान मेरा जिस्म जलाकर चली गयी ।

तूफान चौकीदार बना घूमता रहा ,
आँधी फलों के पेड़ गिरा कर चली गयी ।

मुस्तैद  था मैं रात उसी की मजार पर ,
बरसात पूरी लहद गलाकर चली गयी ।।

जो खोदनी थी मूल उसे खाद दे दिया ,
वो भूल सारी नस्ल हिलाकर चली गयी ।

ऊँचे मकां में कैद हुआ आज आदमी ,
भूकंप की अफवाह डरा कर चली गयी ।

बचपन हमारा भूख गरीबी निगल गयी ,
माँ की कहानी आज रुला कर चली गयी ।

"हलधर" बुरे हालात सदा झेलते रहे ,
कविता वो जिद्दी दाग धुलाकर चली गयी ।
- जसवीर सिंह हलधर, देहरादून 
 

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