होली = (कुंडलिनी छंद) = कर्नल प्रवीण त्रिपाठी

होली = (कुंडलिनी छंद) = कर्नल प्रवीण त्रिपाठी

होली अनुपम पर्व है, रंगों से गुलजार।

तन मन उपवन में दिखे, शुभ रंगीन बहार।

शुभ रंगीन बहार, खेलते मिल हमजोली।

मिटे हृदय से रार, तभी शुभ बनती होली।1

धोकर मन के मैल सब, शुचित करें मन आज।

भस्म करें दुर्गुण सभी, निर्गुण बने समाज।

निर्गुण बने समाज, बीज सद्गुण के बोकर।

निर्मल हों सब आज, बुराई को अब धोकर।2

लाता शुभ वातावरण, होली का त्योहार।

बैर भाव होता क्षरण, बढ़े सभी में प्यार।

बढ़े सभी में प्यार, जोड़ता अनुपम नाता।

नेह और मनुहार, पर्व होली का लाता।3

पिचकारी में रंग भर, खूब भिगोयें अंग।

मल गुलाल हर भाँति के, कर दें सबको दंग।

कर दें सबको दंग, कसर हो पूरी सारी।

बन कर मस्त मलंग, भिगोयें ले पिचकारी।4

ठंडाई सँग भाँग की, महिमा अपरंपार।

उपजे मन सुर ताल नव, फाग कबीर बहार।

फाग कबीर बहार, मधुर धुन मन अति भाई।

चढ़ता अजब खुमार, असर करती ठंडाई।5

कर्नल प्रवीण त्रिपाठी, नोएडा

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