उम्मीद टूटती भी नहीं = विनोद निराश

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आज भी उसे देख कर,
मौन सा हो जाता हूँ मैं  , 
जब कभी रू-ब-रू होती है। 
मैं बोलता नहीं हूँ ,
मगर ये भी सच है ,
नि:शब्द नहीं हूँ मैं । 
जाने क्यूँ वो मुझे देखकर ,
गुम-सुम सी हो जाती है,
आवाज़ तो उसके पास भी है , 
मगर बोलती वो भी नहीं। 
एक अनसुलझी सी, उलझन लिए ,
कुछ अनकही सी बातों में उलझी , 
मेरे जज़्बात को देख कर भी ,
वो मोम सी पिघलती नहीं,
मगर ख्वाहिशे मेरी भी मरती नहीं।  
यूं तो मुझे उससे,
वफ़ा की उम्मीद ही नहीं,
मगर निराश दिल की उम्मीद,  
जाने क्यूँ टूटती भी नहीं ?
= विनोद निराश , देहरादून (शनिवार13 मार्च 2021)  

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