जख्मों में कितना दर्द = जया भराड़े बड़ोदकर

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जख्मों में कितना दर्द है,
खून ये सराबोर वक़्त है,
वक़्त ने कहाँ शिकायत की है ,
यही तो दुनिया की वसीयत ,है 
सहन करना जोखिम है, 
फिर भी खतरा मोल लिया है, 
शब्दों के हथियार शेष  ,हैं 
आंसू सिरहाने मुस्कुराते हैं, 
देते है दस्तक सुकून की, 
जो हर पल की जरूरत है, 
मुलाक़ातों का अब इंतज़ार नहीं, 
भटकती यादों  में, जीवन के प्राण बहुत है, 
यादों ने ही दी है जिंदगी 
वरना ये उलझने तड़पती मौत है 
=  जया भराड़े बड़ोदकर , नवी मुंबई 

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