जाफरानी इश्क = किरण मिश्रा 

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रोज ख्वाबों में मिलने आते हो,
ऐसे मुझको क्यूँ आजमाते  हो। 

फ़िजा में  कुछ तो नमी है आज , 
दर्द इतना भी क्यूँ  छलकाते हो।

हवाओं में  है जाफ़रानी खुशबू,
आह साँसों  में क्यूँ  घुलाते  हो। 

तड़प उठती हैं मिलन को सुबहें,
अश्क़ शबनम में क्यूँ मिलाते हो।

लड़खड़ाता रहा चाँद शब भर,
इश्क़ नजरों से क्यूँ  पिलाते हो।

आओ छत पर तो मिलने कभी,
दिल  इतना भी क्यूँ  जलाते हो।। 
= किरण मिश्रा "स्वयंसिद्धा", नोएडा 
 

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