कौमुदी फिर से खिलेगी - अनुराधा पाण्डेय

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क्या प्रिये ! उर भग्न  तरु में, 
कौमुदी फिर से खिलेगी ?

सिंधु मन का तिक्त बैठा ,
सूखते से राग षडरस ।
जी रहा हूँ दूर तुझसे,
प्रेम पथ का क्या न अपयश ?
बोल ! कब तू व्यग्र सरिता..
सी समद से आ मिलेगी ?
कौमुदी फिर से खिलेगी?

एक युग से मैं तुझे हूँ,
आत्म मन्दिर में सजाये ।
अनवरत शुचि पाद तेरे,
अश्रु से मैंने नहाये ।
पुष्प चंदन मूर्त आकर ,
हाय ! क्या इक दिन न लेगी ?
कौमुदी फिर से खिलेगी ।

रह गये हैं चिर  कुंवारे ,
धुर विरह में घाव मन के ।
और छूने भी न दूँ मैं,
दूसरों को दर्द व्रण के ।
ये हरे इस हेतु रक्खे...
तू इन्हें आकर सिलेगी ।
क्या प्रिये ! उर भग्न  तरु में ।
कौमुदी फिर से खिलेगी ।
- अनुराधा पाण्डेय, द्वारिका, दिल्ली  
 

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