कविता - (मैं भारत हूँ) - जसवीर सिंह हलधर 

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कवि के माध्यम से आया हूँ ।
अध्याय  दूसरा  लाया  हूँ  ।।
जनगणमन की सेवारत हूँ ।
मैं भारत हूँ मैं भारत हूँ ।।

शास्त्री जी स्वर्ग सिधार गए ।
सब जीती बाजी हार गए ।।
घटना पर मुझको संसय है ।
इसमें घर वालों की सय है ।।

क्यों तथ्य विवेचन नहीं हुआ ।
शव का विच्छेदन नहीं हुआ ।।
क्यों पर्दा अब तक पड़ा हुआ ।
यह प्रश्न आज भी खड़ा हुआ ।।

इंदिरा सिंघासन पर बैठी । 
जो रहती थी ऐंठी-ऐंठी ।।
महंगाई ने डाला डेरा ।
मैं भूख गरीबी ने घेरा ।।

राशन पानी का टोटा था ।
तब अर्थ तंत्र भी छोटा था ।।
सडसठ में चीन नहीं माना ।
दोबारा चाहा धमकाना ।।

नाथूला में संघर्ष हुआ ।
मेरा इसमें उत्कर्ष हुआ ।।
बासठ के क्रोधित शेरों ने।
मेरे रणवीर चितेरों ने ।।

एकल ने दस का खून किया ।
ड्रैगन बैगन सा भून दिया ।।
मुश्किल से शांत हुआ झगड़ा ।
ड्रैगन को झटका था तगड़ा ।।

पाकिस्तानी ऐयारों ने ।
सेना के ठेकेदारों ने ।।
ढाका में कत्लेआम किया ।
बंगाल समूचा जाम किया ।।

बंगाली शरणागत आये।
थे शेख मजीबुर घबराये ।।
इंदिरा ने चाहा समझाना ।
लेकिन नापाक नहीं माना ।।

सेना ने उठा लिया भाला ।
दो टूक पाक को कर डाला ।।
इतना भीषण संग्राम हुआ ।
दुनिया भर में कुहराम हुआ ।।

अंगारे उसके राख हुए ।
बंदी यूँ सैनिक लाख हुए ।।
दुनिया ने अब लोहा माना ।
अंदाज इंदिरा का जाना ।।

ऐसा सुंदर सौभाग्य हुआ ।
सिक्किम भी मेरा राज्य हुआ ।।
गोआ को पहले कब्जाया ।
सिक्किम भी साथ खड़ा पाया ।।

लेकिन कुछ काम किये काले ।
मेरे दिल में अब भी छाले ।।
संसोधन इस कर घोंपा भाला ।
मुझको निरपेक्ष बना डाला ।।

संजय ने अत्यचार किये ।
नामी नेता लाचार किये ।।
माँ बेटे की मनमानी से ।
संजय की क्रूर कहानी से ।।

मैं जर्जर औ कमजोर हुआ ।
आतंवाद का जोर हुआ ।।
मनमानी कर ली जी भर के ।
आपातकाल लागू कर के ।।

घर-घर में हाहाकार हुआ ।
आंदोलन का उदगार हुआ ।।
फिर जे पी की आंधी आयी ।
इंदिरा गांधी कुछ घबरायी ।।

जनता पार्टी का उदय हुआ ।
आगे का रस्ता सुलह हुआ ।।
निर्वाचन का एलान हुआ ।
ये निर्णय नेक महान हुआ ।।

इंदिरा गांधी की हार हुई ।
जनता की जय-जय कार हुई ।।
जनता का फिर शासन आया ।
मैंने फिर से वैभव पाया ।।

बंदर भेली का खेल हुआ ।
जनता का शासन फेल हुआ ।।
आतंकों की बदरी छायी ।
इंदिरा फिर सत्ता में आयी ।।

पंजाब प्रांत को घेर लिया ।
गुरुओं का डेरा ढेर किया ।।
भिंडरवाला था दीवाना ।
इंदिरा को चाहा धमकाना ।।

स्वर्ण मंदिर में संग्राम हुआ ।
उसका भी काम तमाम हुआ ।।
मुद्दे को जान नहीं पायी ।
सच को पहचान नहीं पायी ।।

रक्षक ने हत्या कर डाली ।
मेरे सर नाच गयी काली ।।
घर घर में घूमी चंडाली ।
शोणित की बह निकली नाली ।।

लोगों ने मर्यादा खोयी ।
गुरवाणी फूटफूट रोयी ।।
अब और किसी दिन आऊँगा ।
अध्याय तीसरा लाऊँगा ।।
"हलधर" माध्यम से आता हूँ । 
खुद अपनी व्यथा सुनाता हूँ ।।
- जसवीर सिंह हलधर, देहरादून
 

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