कविता -- जसवीर सिंह हलधर 

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एक हाथ में  लिए  तिरंगा  दूजा  वेद कुरान  लिए !
एक मुसाफिर घूम रहा है दिल में हिंदुस्तान लिए !!

जन हित निज सर्वस्व छोड़ जो देश देश में भटक रहा ,
जाता उसी देश में जिसमें काम हमारा अटक रहा ,
बना रहा है दोस्त सभी को भारत भू के उपवन का ,
सब पर रंग चढ़ा देता है तीन रंग के जन गण का ,
मन से कर्म बचन मय वाणी एक नयी पहचान लिए !
एक मुसाफिर घूम रहा है दिल में हिंदुस्तान लिए !!1

तिमिर गुफा से ले भारत को दीप शिखा चढ़ने वाला ,
सपने सवा अरब जन गण की आँखों में गढ़ने वाला ,
दुनियाँ को सदमार्ग दिखाता मंत्र ज्ञान औ दर्शन का ,
भारत को बतलाता है वो सच्चा केंद्र निवेषण का ,
द्वार सभी के लिए खुले हैं मैत्री के प्रतिमान लिए !
एक मुसाफिर घूम रहा है दिल में हिंदुस्तान लिए !!2

मंद मंद उठ रही हवा अब भारत माता के बल की ,
विभा नर्मदा कावेरी की गंगा यमुना के जल की ,
शक्ति प्रदर्शन ध्येय नहीं है वो उत्थान चाहता है ,
अपनी भारत माता की दुनियाँ में शान चाहता है ,
क्षमा शीलता करुणा के संग भारत का सम्मान लिए !
एक मुसाफिर घूम रहा है दिल में हिंदुस्तान लिए !!3

हुआ नहीं जो अभी यहाँ अब भारत में संभव होगा ,
आसमान से बातें करता भारत का वैभव होगा ,
तप कर ये सोना निकला है भ्रष्टाचार मिटाने को ,
सदियों से खोयी ताकत को वापस घर में लाने को ,
हलधर ने कविता लिख दी दिनकर सा रूप विधान लिए !
एक मुसाफिर घूम रहा है दिल में हिंदुस्तान लिए !!
 - जसवीर सिंह हलधर, देहरादून  
 

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