कविता = शिप्रा सैनी 

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छोटी परेड बैंड बाजों की,
बस गिने-चुने बाराती।
बड़ी अनोखी हुई रे ,
कोरोना काल की शादी। 
 
हुआ न खर्चा लड़की वालों का,
थी लड़के वालों की चांदी ।
न सजे शामियाने उम्दा ,
थम गई पैसों की बर्बादी । 

मुँह कोई फुलाये या पिचकाये,
इसका न था कोई टेंशन ।
अपनी सुरक्षा पर आयें,
आमंत्रण पर था मेंशन। 

पाँच दिनों प्रबंध भोजन का,
एक दिन में सिमट गया।
न्योता दिया कुछ लोगों ने ,
कुछ ने तो बस टाल दिया। 

झेला न ज्यादा नयी जोड़ी ने,
झुक-झुक कर न प्रणाम किया ।
फोन पर मिल गया आशीर्वाद,
काम उनका तो निपट गया । 

अब कह लो कुछ भी आप,
शादी न भाये बिन बारात ।
हालांकि खर्चा कम होता है,
पर ऐसी शादी ना रहती याद। 

वह हफ्ते भर की हंसी ठिठोली,
और रिश्तेदारों का जमघट।
बातों की कुछ कानाफूसी,
खेलते- कूदते बच्चे नटखट। 

इन सबका आनंद ना पाया,
रस्मे हुई सब सीधी-सादी।
बड़ी अनोखी हुई रे,
कोरोना काल की शादी । 
= शिप्रा सैनी (मौर्या), जमशेदपुर
 

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