प्रेम मदिरा में तन-मन घुलाती रही - किरण मिश्रा 

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श्याम मोहक छवि दिल बसाती रही,
प्रेम मदिरा में तन मन घुलाती रही!
वो तो कान्हा को प्रियतम बुलाती रही !
वो तो किशना-किशना गीत गाती रही!
वो तो राधे दीवानी कहाती रही... !

कभी कुंजन गली, कभी जमुना के तीर..
ढूँढे कान्हा को राधे ,हर पल होके अधीर..
चीर अँसुअन से वो तो भिगाती रही !
वो तो किशना-किशना गीत गाती रही !
वो तो राधे दीवानी कहाती रही ...!

ऐसा निष्ठुर प्रिय , जो न आया कभी..
गया मथुरा तो गोकुल न भाया कभी !
नेह पाती उद्धव से भिजवाती रही !
वो तो किशना-किशना गीत गाती रही !
वो तो राधे दीवानी कहाती रही ...!

नेह मक्खन सजा,दिल की मटकी लिये!
बाट जोहे..सदा तेरी बंसी लिये ,
मोर पंखी से खुद को भरमाती रही !
वो तो कान्हा-कान्हा बस बुलाती रही !
वो तो राधे दीवानी कहाती रही.....!
दिल की धड़कन पर कान्हा रचाती रही
- किरण मिश्रा "स्वयंसिद्धा", नोएडा 
 

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