टांग = प्रदीप सहारे

टांग = प्रदीप सहारे

टांग एक ,
शरीर का हिस्सा,
उसका भी हैं,
एक एक किस्सा ।
कभी खुली,
टांग का प्रदर्शन,
कमा देता लाखो का धन ।
कभी विपरीत परिस्थीति,
जीयें कोई जीवन ।
मदद का करें हो मन,
" फटे में टांग अड़ाना"
परिचीत कहावत हैं जन।
चलते काम में रुकावट लाना,
कहें उसे हम" टांग अडाना" ।
अब टांग की हैं,
मुश्किल घडी,
बंगाल में किस,
निगोड़े ने खडी खडी,
भरी भीड़ में,
तोड़े की तोड़ी,
शेरनी की टांग तोड़ी ।

✍प्रदीप सहारे, इंदौर
 

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