जिंदगी दरकार है = अनिरुद्ध कुमार

जिंदगी दरकार है = अनिरुद्ध कुमार

आज आया दौर कैसा, देख हाहाकार है,
होश भी बेहोश देखो, आदमी लाचार है।
रो रही है जिंदगी अब, आँख से आँसू बहे,
पूछने वाला नहीं है, मौत का बाजार है।

भीड़ में इंसान खोया, कौन पूछे क्या हुआ,
बोल कैसे हो भरोसा, सांस का व्यापार है।
देख बेगाने लगे सब, लुट गया है आशिया,
हो रहा ये खेल कैसा, बोलना बेकार है।

जो बने सबके मसीहा, अब नजर आते नहीं,
बैठ के अपने घरों से, देखते संसार है। 
गिद्ध सा आँखें गड़ाये, मौत से सहमे सभी, 
बोल ना पाये जुबा से, सिसकियों में धार है।

हाय तौबा सी मची है, कौन किसका यार है।
काम धंधा बंद सारा, भूख से चितकार है।
राह कोई हो बताना, दूर ना मंजिल दिखे,
बेसहारा गिड़गिड़ाता, जिंदगी दरकार है।
= अनिरुद्ध कुमार सिंह, धनबाद, झारखंड
 

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