दूरियों की रेखा - नीलकान्त सिंह

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आज तो चेहरा भी नहीं देखा,
 एक दूजे में दूरियों की रेखा। 
 मौन होता गया है मन  इतना,
 बनी जा रही दूरियों की रेखा।

मन में सबब इतना तू रहा दूर,
मन में बनी है दूरियों की रेखा।
सोचता रहा  कैसी मेरी खता,
क्यों बन रही दूरियों की रेखा ?

अब तो मौन तोड़ो कुछ तो बोलो,
कब मिटेगी दूरियों की रेखा ?
किसी को किसी ने नहीं देखा,
क्यों बढ़ती है दूरियों की रेखा ?
- नीलकान्त सिंह नील, मझोल, बेगूसराय
 

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