खो गये रति औ मदन = अनुराधा पाण्डेय

खो गये रति औ मदन = अनुराधा पाण्डेय

चाँद भी था गुनगुनाता,गुनगुनाती चाँदनी

तार वीणा के कसे थे,थी निकलती रागिनी

पास के ही इक विटप से,कूकती थी कोकिला

राग वर्धित हो रहे थे ,एक रति थी चंचला

मंद झोंके थे मलय के,और बूदें श्रावनी

पुष्प कलिका झूमती थी,मग्न रस पा पावनी

नेह को देती निमंत्रण,मध्य पूनम रात थी

हो रही मानो गगन से,काम की बरसात थी

सेज गंधिल हो रही थी , रंगमय रनिवास था

कक्ष में ही ज्यों उतर आया,लगे मधुमास था

हो रहे अनुवाद ज्योँ थे,दो हृदय उन्माद के

यामिनी थी छंद रचती,प्रेम मय अनुनाद के

खो गये रति मदन मृदु,स्वर्गमय अभिसार में।

मात्र दो ही जन बचें ज्यों,यों लगा संसार में।

नेह में डूबे हुए द्वय ,पा गये विभु सार थे

मिट गये थे बहु व्यथा के,जो विसंचित भार थे

= अनुराधा पाण्डेय,द्वारका,नई दिल्ली

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