प्रणय गीत - अनुराधा पाण्डेय

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गीत समझ कर लिखे न मैंने,
कभी न इनको गाया जाए ।
शब्द जनित कविता से मेरा ,
बोलो तुम ही !कब था नाता ?
मूर्त छंद-सा मिले मुझे तुम 
वर्णों से क्या कुछ बन पाता ?
मैंने तुमको 'हृदय' लिखा था,
उनको क्यों जग गीत बताता?
मैंने हरदम ही रोका है.....
उन्हें न जन तक लाया जाए ।
गीत समझ कर लिखे न मैंने,
कभी न इनको गाया जाए ।

मैंने तुमसे सदा कहा है ,
गीत न होता जीवन- जैसा ।
शब्द सखे ! यदि प्रणय लिखेगा,
कभी न होगा पावन- जैसा ।
वर्षा बूँदें,बादल लिखना,
कभी न सुख दे सावन-जैसा ।
वाक्यों पर क्या प्राण लुटाना ....
मात्र तुम्हें दुलराया जाए ।
गीत समझ कर लिखे न मैंने,
कभी न इनको गाया जाए ।

पता नहीं जग क्यों रति कहता,
शब्दों के इस जड़ अभिनय को?
जीवन की सर्वोत्तम कविता ,
पढना हो तो पढ़ो 'हृदय' को ।
आकर देखो प्राण ! दृगों में ,
चाहो यदि साक्षात प्रणय को ।
मैं कहती प्रिय !जीवन को ही...
मधुरिम गीत बनाया जाए ।
गीत समझ कर लिखे न मैंने,
कभी न इनको गाया जाए ।
अनुराधा पाण्डेय, द्वारिका, दिल्ली
 

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