गीत = अनिरुद्ध कुमार

गीत = अनिरुद्ध कुमार

झरझर बहता नीर
छोड़ चली बाबुल का डेरा, कैसी ये तकदीर।
ऐसी पीर समाई दिल में, झरझर बहता नीर।।
           छूटा बचपन चढ़ी जवानी, 
           मुन्नी कहलाती अब रानी।
           पापा मम्मी कहते रहती,
           दादी पुचकारे सुन नानी।
           लोग पुकारे लाडो लाडो,
           घर में रहती बन महरानी।
कैसा निर्मम है ये विधना, पलपल सोंच अधीर। 
कैसी पीर समाई दिल में, झरझर बहता नीर।।
           साजन सजधज ठाड़े द्वारे,
           दो कुल की है लाज बचानी।
           छोड़ चली सब गुड्डा गुड्डी,
           बाबुल पीहर सब बेमानी।
          डोली घेरे सखियाँ झाँके,
          नैनों में है छलछल पानी।
भाई, भाभी कुछ ना बोले, चीखें छाती चीर।
कैसी पीर समाई दिल में, झरझर बहता नीर।
          किस झंझट में लगता डाला,
          नैहर ससुरा खींचातानी।
          नव रिश्तों का तानाबाना,
          सास, ससुर, देवर, जेठानी।
          धधक रहा तन ज्वाला जैसा,
          हर कोई करता मनमानी।
तिनका बनके यौवन बिखरा, पावों में जंजीर।
कैसी पीर समाई दिल में, झरझर बहता नीर।।
          बोलो कितनी पीड़ा झेलूँ,
          हे अंबर धरती के स्वामी।
          रानी को दासी कर डाला,
          बीते कल की ये नादानी।
          अंतरयामी हे रखवाले,
          कब तक होगी ये मनमानी।
जलन अगन नैनों में झलके, बात बड़ी गंभीर।
कैसी पीर समाई दिल में, झरझर बहता नीर।।
= अनिरुद्ध कुमार सिंह, धनबाद, झारखंड.

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