गीत = अनिरुद्ध कुमार

गीत = अनिरुद्ध कुमार

अंदर गम है,आँखें नम है, धधक रही है ज्वाला।
कैसे कोई करे भरोसा, क्या से क्या कर डाला।।
लाचारी में नैन निहारे,
हैवानों के वारे न्यारे,
डर जाता मन देख इशारे,
बोलो कोई किसे पुकारे,
गिद्धों का पौबारह लगता, सबके मुख पर ताला।
कैसे कोई करे भरोसा, क्या से क्या कर डाला।।
जैसे तैसे निकले घर से,
जीवन प्राणवायु को तरसे,
कांप रहा सारा तन डर से,
बोलो कोई कैसे हर्षे,
रोगी मर जाता है लड़ते, जनता पीती हाला।
कैसे कोई करे भरोसा, क्या से क्या कर डाला।।
दिखे नहीं जीवन रखवाला,
काले धंधों में मतवाला,
सरेआम है गड़बड़झाला,
लोग ढ़ूढ़ते कहाँ उजाला,
रिश्वतखोरी पांव पसारे, गली गली मधुशाला।
कैसे कोई करे भरोसा, क्या से क्या कर डाला।।
इधर लगाई उधर बुझाई,
जनसेवक भी करे कमाई,
कौन यहाँ पर हातिमताई,
निर्धन करता फिरे लड़ाई,
बोले सब कानूनी भाषा, स्वार्थ में मतवाला।
कैसे कोई करे भरोसा, क्या से क्या कर डाला।।
= अनिरुद्ध कुमार सिंह, धनबाद, झारखंड।

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