मन - जया भराडे बडोदकर

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मन की भाषा बड़ी अजीब है,

बुद्धी की तो दुश्मन है ये,

मिठा-मिठा सदा ये कहती,

कड़वा सच ये कभी न कहती।

दूर-दूर के मालपुए पकाए,

दिल चाहे वहाँ पतंग उड़ाती

असली सत्य समझ न आए,

अपना स्वार्थ बस इतना ही सोचती।

मतलब की खूब समझती,

हर जगह शॉर्ट कट अपनाती,

जीवन में दुःख होता तो ये,

दोष सारा दूसरो पर मढ़ती।

खाना पीना मजा ये चाहे,

कष्ट परिश्रम से सदा ही भागे,

मतलब से गधे को बाप बनाये,

वरना सबको ये अकड़ दिखाये।

सब कोई जाने रंग-ढंग इसके,

पर चालों की इसके कोई बच न पाए,

जो बच जाए वो अछुता,

अनमोल हीरा बन जाए।

- जया भराडे बडोदकर, नवी मुंबई (महाराष्ट्र)

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