माटी हमरे गाँव की = अनिरुद्ध कुमार

माटी हमरे गाँव की = अनिरुद्ध कुमार

भूल नहीं पातें वो खुश्बू , बूढ़े बरगद छांव की।
चंदन से भी सूंदर वंदन, माटी हमरे गाँव की।।
            भोर पहर में काग उचारे,
            जीवन पथ पर दौड़ लगारे।
            शुरू अर्चना घंटी बाजे, 
            पंडित जी चालीसा बाँचे।
            पनिहारी गगरी ले रागे,
            पनघट पर मेला सा लागे।
अपने अपने काम में भागे, अभिवादन इंसान की,
चंदन से भी सूंदर वंदन, माटी हमरे गाँव की।।
            मीठे सुर में कोयल गाये,
            पुरवाई मन प्रीत जगाये।
            कुहू कुहू सूदूर सुनाये,
            बांसुरी तान मनको भाये।
            कोई घूंघट में शरमाये,
            मनमितवा को पास बुलाये।
दादी रह रह करें चिरौरी, चाह किसी सामान की।
चंदन से भी सूंदर वंदन, माटी हमरे गाँव की।।
             नौनिहाल नित उधम मचाये,        
             लोटपोट के धूल लगाये।
             बात बात में कट्टी मिट्ठी,   
             मुसकाये जीवन सुख पाये।
             नैनों में अमृत का खजाना,
             रूठें तो गालों पर आये।
बचपन, यौवन मन हर्षाये, चर्चा बैठ जहान की,
चंदन से भी सूंदर वंदन, माटी हमरे गाँव की।।
               बात बात में दाव लगाये,
               दुख सुख में सब साथ निभाये।
               अटुट प्रेम का बंधन बांधे,
               भोज भात सब मिलके खाये।
               चौपालों में जीवन दर्शन,
               हुक्का पानी गप्प उड़ाये।
रामायण सब मिलकर बांचे, कथा कहे श्रीराम की,
चंदन से भी सूंदर वंदन, माटी हमरे गाँव की।।
= अनिरुद्ध कुमार सिंह, धनबाद, झारखंड।

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