मै और मेरी अलमारी  (हास्य  कविता) - झरना माथुर

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मै और मेरी अलमारी,
     एक दूजे को बेहद प्यारी,
जैसे ही मै उसके पट खोलू,
     कपड़े चरण छूते ये हमारी,
हाय बिचारी मेरी अलमारी।

मगर दिल बहुत बड़ा है उसका,
         हर मौसम ब्यबहार हैं एक सा,
सबके ह्रदय को ही बहुत भाति,
          हमारी चीजे सहजती सारी,
हाय बिचारी मेरी अलमारी।

ऊपर से नीचे तक भरी है,
         जगह जरा सी उसमे नहीं है,
पर जब कभी मै घुमने जाऊँ,
           कोई ड्रेस भी नहीं है न्यारी,
हाय विचारी मेरी अलमारी।

अलमारी की भी बिडंबना ये,
          झगड़े की उसे आदत हैं ये,
चाहे उसको कितना सम्भालू,
          सदेव रह्ती बोझ की ये मारी,
हाय विचारी मेरी अलमारी।
- झरना माथुर, देहरादून , उत्तराखंड 
 

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