मोहनी प्रिय - अनुराधा पांडेय

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मोहनी प्रिय ! जानतें हैं ।आँख के अंजन तुम्हारे ।

चारु चपला हाय ! चितवन,
मौन है पर बोलती है ।
अस्ति गंधिल सप्तवर्णी
रंग मन में घोलती है ।
यों लगे है झर रहे हर,
रोम से चंदन तुम्हारे ।
आँख के अंजन तुम्हारे ।

कुंतलित लट खोलकर जब,
बैठ जाती तुम निलय में ।
छू सके इनको प्रथम बढ़,
होड़ लग जाती मलय में ।
पारिजाती गंध लगती ,
उड़ रही आंगन तुम्हारे ।

मोहिनी प्रिय!जानते हैं, आँख के अंजन तुम्हारे...
- अनुराधा पांडेय, द्वारिका , दिल्ली
 

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