मोक्षदायिनी मां गंगा = ज्योत्स्ना रतूड़ी

मोक्षदायिनी मां गंगा = ज्योत्स्ना रतूड़ी

हे मां गंगे पतित पावनी मोक्षदायिनी शाश्वत सनातन,
बहती कलकल निश्चल निर्मल संस्कृति हैसबसे पुरातन।
उत्पन्न हुई ब्रह्मा के कमंडल से स्वर्ग से आई धरती पर,
तरने पूर्वजों को राजा भगीरथ के आग्रह विशेष पर।
उद्गम स्थल गोमुख से गंगोत्री प्रवाहित होती हुई,
पहुंचती है गंगासागर मार्ग में पापियों के पाप धोते हुई।
आता जो भी तेरे श्रद्धा शरण समा लेती अपने अंक में,
जैसे एक मां अपनी संतान को समा लेती दो नैनन मे।
बिन तेरे पूरण नहीं होते हैं शुभ कर्म या संस्कार,
स्नान करके तर्पण देकर धुल जाते हैं सारे विकार।
सदियों से भारत की पावन पवित्र सबसे लंबी नदी मां,
बहती है जहां खुशहाली हरियाली लाती है वहां मां।
बारह वर्ष में पावन कुंभ के मेले लगते हैं हर बार,
इलाहाबाद नासिक उज्जैन तथा एक और है हरिद्वार।
रखते हैं सभी श्रद्धा गंगा दशहरा के पावन पर्व में,
कहते हैं कभी कीड़े नहीं पड़ते मां के पवित्र जल में।
आते हैं दर्शन को तेरे सभी देश और प्रदेश से,
मन में श्रद्धा के सुमन लिए साथ ही शुद्ध भाव से।
पूजते हैं हम सब मां को हृदय से होकर भाव विह्वल
तो लो संकल्प अटूट रखेंगे उसको स्वच्छ व निर्मल।
= ज्योत्स्ना रतूड़ी *ज्योति*, उत्तरकाशी, उत्तराखंड

Share this story