माँ आखिर माँ होती है (संस्मरण) = डॉ. भूपिंदर कौर

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बात उन दिनों की है कि जब मेरे दोनों बच्चे छोटे थे। बेटा दो साल का, तो बेटी 2 महीने की थी।  माँ मुझे लेने के लिए गाँव से दिल्ली आई थी।  मेरे घर एक शादी थी। उसमें शामिल होने के बाद हम दोनों ग़ाँव जाने वाले थे। मैं महाराष्ट्र से हूँ और मेरी शादी दिल्ली में हुई है। सारे कार्यक्रम बहुत अच्छे से निपट चुके थे। वे दो-चार दिन यहाँ, और फिर अपने मायके में अपने परिवार के साथ रहीं। उनका मायका दिल्ली में और शादी गाँव में हुई थी। पर उन्होंने पहले से ही सोच रखा था कि  मैं अपनी बेटियों की शादी गाँव में नहीं करूँगी और वैसा ही किया था। हम दोनों बहनों की शादी दिल्ली में करवाई थी। उनके साथ अपने गाँव, अपने मायके जाने के लिए निकली। मैं अपने पति, बच्चे और सामान के साथ नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर पहुँच चुकी थी। मम्मी जी, मामा जी के साथ आने वाली थीं। मामा जी कुली के साथ जल्दी-जल्दी चल रहे थे और हमें मिल गए थे। मम्मी जी थोड़ा धीरे चलने की वजह से पीछे रह गई थीं। मेरा और मम्मी जी का सामान हमनें रखवा दिया था। मैंने सारा सामान सेट कर लिया था।  मेरे पास खाने-पीने के सामान के साथ छोटे-बड़े 14 नग थे। मम्मी का इंतजार हो रहा था। मामाजी उन्हें देखने के लिए फिर से पीछे की तरफ गए। मेरे पति बहुत परेशान हो रहे थे। गुस्सा हो रहे थे। कि ये कैसी लापरवाही है?  तुम छोटे बच्चों के साथ यहाँ पहुँच चुकी हो और इतना सारा सामान भी तुम्हारे पास है और मम्मी जी का अभी तक कोई पता नहीं ? मैं खुद भी बहुत परेशान थी और चुपचाप सुन रही थी। कुछ बोल नहीं सकती थी। थोड़ी देर में ट्रेन चल पड़ी। किसी ने यह नहीं सोचा कि चेन खींच ले, तो ट्रेन रुक जाएगी। मेरे पति भी जल्दी-जल्दी गाड़ी से उतर गए। मैं अकेली 14 नग और दो छोटे बच्चे। मुझे बहुत रोना आ रहा था। डर भी लग रहा था। इस तरह अकेले मैंने कभी सफर नहीं किया था। फिर भी पता नहीं क्यों चुपचाप बैठी रही गई।
     एक डेढ़ घंटे के बाद टीटी आया और मुझसे टिकट माँगने लगा और जो सबसे बड़ी बात थी वह यह कि टिकट मम्मी जी के पास थे। मैं परेशान हो रही थी। टीटी बार-बार मुझसे टिकट लेने के लिए दबाव डाल रहा था। मैंने कहा, सर ! मैं टिकट ले चुकी हूँ, अभी फिर से तो नहीं ले सकती। मम्मी के पास टिकट हैं। किसी कारणवश मुझसे अब तक नहीं मिल पाई। अब सारा सामान और बच्चों को छोडकर उन्हें ढूंढने भी नहीं जा सकती। जैसे ही वह आ जातीं हैं, मैं आपको टिकट दिखा दूंगी। वह फिर भी टिकट लेने का दबाव डाल रहे थे । और मैं उन्हें बार बार यही कह रही थी कि मैंने टिकट लिया हुआ है जो मेरी मम्मी के पास है। वह अभी आ जाएंगी। पता नहीं कैसे मुझे इस बात पर विश्वास था! 

सुबह 10:30 बजे झेलम एक्सप्रेस दिल्ली से निकली थी और ग्वालियर में 4:30 बजे के करीब पहुंचीं। मेरी निगाहें अब भी उनको ढूँढ रही थी। ग्वालियर स्टेशन पर  मैंने मम्मीजी को देखा .. वह बहुत मुश्किल से जल्दी-जल्दी चलने की कोशिश कर रही थी।  मैंने अपनी बच्ची को अपने सामने वाली सीट पर बैठी स्त्री की गोद में डाल दिया और नंगे पाँव भागी। उनका हाथ पकड़ कर अपने साथ ले आई। हम दोनों की आँखों में खुशी के आँसूं थे। सुबह से भूखी प्यासी थीं। बहुत ही कठिन समय बीता था। मैंने मम्मी से पूछा, कहाँ रह गई थी आप? वे बोलीं कि जब मैं एक नंबर प्लेटफार्म पर आ रही थी, तो अनाउंसमेंट हुई कि झेलम एक्सप्रेस 4 नंबर प्लेटफार्म पर आ रही है।  भाई साहब (मामा जी) जल्दी-जल्दी आ गए निकल गए थे , मुझे नजर नहीं आ रहे थे। जब तक मैं धीरे-धीरे किसी तरह 4 नंबर प्लेटफार्म तक पहुंची तो गाड़ी ने स्पीड पकड ली थी। मैं जानबूझकर भाई साहब से (मामा जी) से नहीं मिली। मैंने उनको देखा था, वह मुझे ढूँढ रहे थे। मैं छुप गई थी क्योंकि मुझे पता था वह मुझे अकेले नहीं जाने देंगे। और मुझे सबसे ज्यादा चिंता तुम्हारी हो रही थी कि छोटे बच्चों के साथ तुम कितना परेशान हो रही होंगी? कैसे सफर कर पाओगी? यही सोच कर मैं उनसे नहीं मिली और पीछे से आने वाली कर्नाटका एक्सप्रेस में जाकर बैठ गई। क्योंकि कर्नाटका एक्सप्रेस की स्पीड गोवा एक्सप्रेस से बहुत ज्यादा होती है। उन्हें यह बात इसलिए भी पता थी कि साल में एक दो बार तो दिल्ली आना-जाना लगा रहता था। फिर मम्मी बोलीं कि मैं हर एक स्टेशन पर उतर कर कभी लोगों से, कभी कुली से पूछ रही थी कि गोवा एक्सप्रेस चली गई क्या? जब पता चलता कि चली गई, तो मैं फिर से वापिस जाकर कर्नाटका एक्सप्रेस में बैठ जाती । जब मैं ग्वालियर पहूँची तो वहाँ पर मैंने पता किया कि गोवा एक्सप्रेस आई है? पता चला कि अभी आने वाली है। मैं वहीं उतरकर गोवा एक्सप्रेस का इंतजार करने लगी और जैसे ही गोवा एक्सप्रेस आई तो मैं जल्दी से गोवा एक्सप्रेस में बैठने के लिए भागी।  उनको पूरा विश्वास था कि मैं यहाँ उन्हें मिल जाऊँगी और मैं उनको ले आई। मैंने उनको साथ बिठाया पानी पिलाया। सुबह से हमने कुछ भी नहीं खाया था। सारा खाने-पीने का सामान मेरे पास था। हमने मिलकर बहुत खुशी से बहुत स्वाद से खाना खाया। हम दोनों की आँखों में खुशी के आँसू थे जैसे हमनें वक्त पर विजय प्राप्त कर ली हो। मुझे मम्मी की समझदारी और सूझ-बूझ पर बहुत गर्व हो रहा था। अब वह मेरे लिए झाँसी की रानी बन गयी थी। मेरी शेरनी माँ थी। जिन्होंने साबित कर दिया था कि माँ आखिर माँ होती है। जो बच्चों की खातिर हर मुसीबत में जान पर खेल जाती है। धन्य हो माँ।
- डॉ. भूपिंदर कौर, नई दिल्ली
 

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