माँ = सन्तोष सैनी

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चूल्हे की
जलती रोटी सी
तेज आँच में जलती माँ !
भीतर -भीतर
जलके फिर भी
बाहर नहीं उबलती माँ !

धागे - धागे
यादें बुनती ,
खुद को
नई रुई सा धुनती ,
दिन भर
तनी ताँत सी बजती
घर -आँगन में चलती माँ !

सिर पर
रखे हुए पूरा घर
अपनी –
भूख - प्यास से ऊपर ,
घर को
नया जन्म देने में
धीरे -धीरे गलती माँ !

फटी -पुरानी
मैली धोती ,
साँस - साँस में
खुशबू बोती ,
धूप - छाँह में
बनी एक सी
चेहरा नहीं बदलती माँ !
= सन्तोष सैनी, खेतड़ी नगर
 

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