स्वप्न मेरे मर न जाएं - अनुराधा पाण्डेय

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द्वार खोलो आज प्रियवर! हूँ खड़ी मैं द्वार पर।
स्वप्न मेरे मर न जाएं, स्वप्न का सम्मान कर ।

रख रही हूँ आज अपना, भाग्य तेरे ठौर पर,
कह रही जो बात प्रियवर, आज उस पर गौर कर ।
गीत रच दे आज मुझपे, प्रिय ! मुझे उनवान कर ।
स्वप्न मेरे मर न जाएँ,स्वप्न का सम्मान कर ।

शक्ति बनकर तुम बसे हो, शुद्ध मेरी चेतना,
प्राण! शामिल जिन्दगी में ,लुप्त मेरी वेदना ।
साध मेरी चेतना तू,चेतना का ध्यान कर ।
स्वप्न मेरे मर न जाएँ, स्वप्न का सम्मान कर ।

द्वार खोलो आज प्रियवर, हूँ खडी मैं द्वार पर ।
मौन मेरा आज बोले, पर..विवश, मेरे अधर।
सह न पाऊँ , मैं विरह,रे! आज मेरा रुद्ध स्वर।
वेदनामय इस हृदय में ,प्यार शर संधान कर,
स्वप्न मेरे मर न जाएं, स्वप्न का सम्मान कर
द्वार खोलो आज प्रियवर! हूँ खड़ी मैं द्वार पर
- अनुराधा पाण्डेय, द्वारिका दिल्ली
 

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