प्राण में मेरे समाकर = अनुराधा पाण्डेय

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प्राण में मेरे समाकर परिणिते!
आज कुंतल छाँह मुख पर तुम करो। 

आचमन श्रृंगार रस में डूबकर,
प्रेम रज से माँग भर लो कृष्णिके !
आभरण सारे पहनकर नख शिखा,
आज दर्पण में सँवर लो कृष्णिके ! 
हाथ में मेंहदी रचा मदयन्तिके !
आज कुंतल छाँह तुम मुख पर करो ।

प्राण में मेरे समाकर परिणिते !
आज कुंतल छाँह तुम मुख पर करो ।
= अनुराधा पाण्डेय, द्वारिका, दिल्ली
 

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