रात = दीपक राही 

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रात समंदर सी,
देखो तो दूर तक अंधेरा,
अपने में ढेरों कहानियां समेटे हुए,
बेपरवाह, शांत,
अपने आगोश में लेकर सुकून देती,
आंखों में अंधेरा रात ही देती,
समंदर ने राज डुबाये,
रात ने अनेक राज छुपाए,
जुगनूओ की रोशनी को,
रात ने सितारे बनाए,
रात आती है,
सो दर्द जगाती हैं,
समंदर की लहरें है
छौर मचाती,
रात गमों का समंदर है 
बन जाती,
अनसुलझे सवालों का हैं,
बवंडर बन जाती,
रात किसी की ना हो अधूरी,
चाहे हो कितनी भी दूरी,
हमारा दिल और समंदर भी,
रात में ही बहकता है,
दिल फरेबी,
ढलता भी डूबता भी,
रात ढ़लती फिर आती,
समंदर में लहरें ती जाती,
दोनों ही तरसते किनारे को।
रात एक नई सुबह को लाती,
समंदर वैसा ही रहता है।
= दीपक राही, आरएसपुरा, जम्मू  

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