उफ ! झूठा है प्रिय ! शरमाना = अनुराधा पाण्डेय

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पलकों को नत कर मुस्काना ।
उफ ! झूठा है प्रिय ! शरमाना ।
धत्त मदन !सच पागल हो क्या,
अवगुंठन का करते अभिनय ?
अब यह दूरी बोलो ! कैसी,
जब दो उर का है दृढ़ परिणय ।
निज देख निलय में दुल्हन को ,
सीखे हो किससे छुप जाना ?
उफ ! झूठा है प्रिय ! शरमाना। 

देखो ! रूठ गई मैं भी तो ,
कैसे मुझको प्यार करोगे ?
ज्ञात मुझे उर दशा तुम्हारी ,
पूर्ण निशा मनुहार करोगे ।
मुख से झुठला तो सकते हो...
नैनों को मुश्किल झुठलाना ।
उफ ! झूठा है प्रिय ! शरमाना।

एक झलक मेरी पाने को 
याद करो वो तरसा करना ।
याद मुझे वे नैन तुम्हारे,
औ उनका नित बरसा करना ।
मुझे ज्ञात संकोच नहीं यह...
है महज तुम्हारा इठलाना ।
उफ ! झूठा है प्रिय! शरमाना।
= अनुराधा पाण्डेय, द्वारिका, दिल्ली
 

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