कविताएं बहुत कुछ कहती हैं - किरण मिश्रा 

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कविताएं ,
बहुत कुछ कहती हैं,
हंसती हैं, रोती हैं,
मुस्कुराती, तो नाराज भी होती हैं।
सुख-दुख , मनुहार तो कभी
मिलन-विछोह की पीड़ा भी सहती है।

कभी लहलहा उठती हैं, 
खुशियों से 
खेतों में झूमती 
पीली सरसों सी 
तो 
कभी महकाती हैं 
अमराई मन की
कुहू-कुहू मीठी कोयल बन।

नदिया सी मीठी 
बहती है अपनी ही मस्ती में 
रसधार लिए,  
सीचती हैं, दग्ध दिलों को
हरियाती हैं विरही मन ।

तो ,
कभी अमावस रात में भी 
बिछ जाती हैं मन के 
बिस्तर पर चाँदनी बन, 
चाँद की शीतलता ओढ़।

झरती हैं झर-झर 
हरसिंगार सी पन्नों की दूब पर
और
महकाती हैं 
यादों के गलियारे 
अहसासों की संदली बयार पा।

छलक उठती हैं
झरने सी, 
पलकों के कोरों से।

जज्बातों के आँचल 
छू बहक जाती हैं,
झूमती हैं कचनार सी।

गुलमोहर का रंग ओढ़
दहकती है शब्दार्थ का नव नव रूप ले।

सुर्ख गुलाब सी
प्रेयसी बन लुभाती हैं
किताबों की रूह बन।

और अनगिनत प्यासे 
पाठकों को तृप्त कर 
समा जाती हैं भावों की भंगिमा ले
किसी पाठक की किताबगाह में, 

कविताएं जीवन्त रूह है, 
किसी कवि की कोमल कल्पना की..... 
जो संजोती.... हैं भूत भविष्य और वर्तमान 
कवि मन के आइने में...।

हाँ कविताएं बहुत कुछ कहती हैं...
सहती हैं और चुप रहती हैं....
प्रेम की पीड़ा ले...  
श्वेत श्याम पन्नों के तहखानों में .!! 
- डा किरण मिश्रा #स्वयंसिद्धा , नोएडा उत्तर प्रदेश
 

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