कवि गिरिजा कुमार ने ओड़िआ कविता धारा को अभिन्न परंपरा प्रदान की - अनिमा दास

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utkarshexpress.com, कटक (ओड़िआ) - कवि गिरिजा कुमार बलियारसिंह ने सत्तर परवर्ती ओड़िआ कविता धारा को अपनी मौलिकता से एक अभिन्न परंपरा प्रदान की है । वह ओड़िआ सोनेट की भूमि पर विभोर तपस्वी के रूप में विद्यमान हैं। विशाल सोनेट साम्राज्य के सृष्टा श्री गिरिजा जी के प्रकाशित ग्रंथ हैं, क्रोंच मिथुन, नील निर्वाण, तृष्णा तर्पण, भारत वर्ष, चित्र प्रतिमा, शीत शीर्षक, उत्तर मेघ , चारण चर्या एवं काव्य पुरुष।
इस समय खंड को सुवर्णमय समय के रूप में मानने का एकमात्र कारण है कि कवि गिरिजाकुमार बलियारसिंह की सोनेट साधना। सहस्राधिक सोनेट का सृष्टा, विस्मयकारी काव्य पुरुष को संप्रति ओड़िआ भाषा साहित्य के समीक्षक गण सोनेट सम्राट उपाधि प्रदान कर अपने विस्मय मिश्रित पुलक एवं प्रणिपात प्रदान कियें हैं । 2003 से 2015 के अवधि में कवि गिरिजा जी के प्रकाशित सोनेट की संख्या के आधार पर इस चरण को सुवर्ण काल मानने के पर्याप्त ठोस कारण हैं। 2003 से 2015 के मध्य कवि गिरिजा जी के नौ सोनेट संकलन में कुल 983 सोनेट प्रकाशित हुये हैं। सद्य प्रकाशित (पदपुराण) सोनेट संकलन को सम्मिलित करने से यह संख्या सहस्राधिक हो जाती है। उल्लेखनीय है कि कवि गिरिजा जी 'चउदाली' नामक एक नूतन काव्यिक रूप भी सृष्ट कर चुकें हैं। प्रेषित सोनेट "महानदी " कवि गिरिजा जी के "नीलनिर्वाण" सोनेट संकलन से लिया गया है जिसमें कवि पुराण से इतिहास एवं इतिहास से आधुनिक काल पर्यंत १०८ नारी चरित्रों को लेकर सोनेट रचित कियें हैं ।
कवि गिरिजा जी की निरंतर साधना तथा पाठक गोष्ठी के प्रति सहज स्नेह ने कई प्रवीण एवं तरुण कवियों को सोनेट की ओर आकृष्ट किया ।
महानदी - 
अक्षरों के आषाढ़ में, अनंतर शब्दों के सावन में 
तिल से त्रिकाल पर्यंत, तुम्हें तीर्ण करती तिलोत्तमा, 
तृष्णा के नक्षत्रों को सहेजता रहूँगा तुम्हारे ताल वन में 
मांग में सजाती रहो , मेरे रक्त की रंगीन ऊषा, हे, प्रियतमा !

समय के उस पार से, आओ स्वरवर्ण सा कर श्रृंगार 
व्यंजनवर्ण की व्यथा हो विस्मृत - इस जन्म के प्रेत को
भाषातीत भाद्रपद में,आशातीत अश्विन में लिये उभार 
मेरे मोक्ष की महानदी..आओ, लांघ कर संकट संकेत को 

आवर्तन तुम्हारे आलिंगन का रहे सदा दिगंत पर्यन्त 
बह जाए भय - भ्रांति जितनी भूतपूर्व प्रणय की,जो गयीं हैं पसर 
कौन बाँध सकता तुम्हे, यदि तुम्हारी अनिच्छा  हो अत्यंत ? 
हे, ओतप्रोत ओजपूर्ण ओंकार  ! उतर आओ आज  अधरों पर 

महोदधि के हृदय में हो जाओ लीन, हे महानदी तरंग  !
प्रेम के इस प्रलय में विश्वास ही बन वटपत्र रहे अंतरंग ।

- मूल रचयिता - कवि गिरिजा कुमार बलियारसिंह (1954)
अनुवादिका - अनिमा दास, हिंदी कवयित्री, कटक, ओड़िशा
 

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