सकारात्मक सोच (लघु कथा) = ज्योत्स्ना रतूड़ी

सकारात्मक सोच (लघु कथा) = ज्योत्स्ना रतूड़ी

एक बार एक पत्नी अपने पति से प्रतिदिन कहती थी कि तुम मुझे कहीं घुमाने नहीं ले जाते । पति ने कहा "ठीक है तुम हमेशा कहती हो चलो इस बार मैं तुम्हें कहीं घुमाने ले जाता हूँ। " उन्होंने सारी तैयारी कर ली वह दोनों पहाड़ी स्थान पर घूमने के लिए निकले ।
अब बस में बैठे तो बस में एक बुजुर्ग व्यक्ति खांस रहा था। उसकी पत्नी ने कहा :यह आदमी इतना क्यों खांस रहा है ,मुझे तो इसके खांसने से सर दर्द हो रहा है ।"उसके पति ने कहा कोई बात नहीं बस में तो कई प्रकार के लोग बैठते हैं तो इधर ध्यान मत दो।" फिर अचानक कहने लगी ," बगल वाले आदमी के जूते से बहुत बदबू आ रही है, मैं कैसे बैठूं।" तो उस व्यक्ति ने कहा कि कोई बात नहीं तुम वहां से अपना ध्यान हटा लो।
अब दोनों बस स्टेशन से उतर कर होटल की तरफ से गये। होटल में बहुत अच्छे खाने रहने की व्यवस्था थी । पर वह महिला पूरे घूमने के दौरान एक बार भी खुश नहीं हुई। उसने अपने पति से पूछा कि तुमने कितने रुपए खर्च करें घूमने फिरने पर, तो उसने बताया की 50 हजार रुपए। उस महिला ने कहा कि" 50,000 तुमने यहां खर्च कर दिए क्यों खर्च करें इससे बढ़िया यह पैसे हमारे कहीं और काम आते हैं।" तो उसके पति ने कहा कि "तुम ही तो रोज कहती हो कि मुझे कहीं घुमाने ले चलो इसलिए मैं घुमाने लाया और तुम तो एक बार भी खुश नहीं हुई। "
फिर वह होटल से घर के लिए निकले तो रास्ते में पति का दोस्त मिला। उसने कहा कि "और सुनाओ दोस्त कैसे चल रहा है सब।" तो उसने कहा कि "मैं तो ठीक हूं लेकिन तुम्हारी भाभी जी ने दुखी रहने की मशीन ले रखी है।" उनको कहीं खुशी नजर नहीं आती ।हर जगह जहां अच्छा भी होगा वहां भी उनकी दृष्टि नकारात्मकता पर जाती है। हमें अपनी सोच को सदैव सकारात्मक रखना चाहिए नकारात्मकता में भी हमको सकारात्मक परिस्थिति को ढूंढना चाहिए ।क्योंकि कहते हैं कि*जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि * जैसा हम सोचते हैं वैसे हम को दिखता है, तो हमें सदैव सकारात्मक सोच रखनी चाहिए जिससे  *हम स्वस्थ रहें प्रसन्न रहें * नहीं तो जो व्यक्ति खुश नहीं रहता है उसको चाहे तुम कहीं भी रख लो वह कभी खुश नहीं हो सकता ।छोटी-छोटी बातों में खुशियां ढूंढो। 
= ज्योत्स्ना रतूड़ी ज्योति , उत्तरकाशी, उत्तराखंड

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